तन्हाई
जिंदगी की राह में तन्हाई मैंने पा लिया जिनका
भी गम मिला अपना बना लिया, सुनाने को मिला
न कोई दास्ताँ-ए-गम,आईना रखा सामने और खुद को सुना दिया |
कैसे मनाऊँ तेरी रुसवाई को कैसे समझाऊं अपनी
तन्हाई को, कि तू जा चुकी है यूँ छोड़ के मुझको, कि तन्हाई भी अब मेरी मुझे चिढाती
है कि जिससे थी इतनी मोहब्बत तुझको वही बना गया है तेरा यार मुझको |
वो भी क्या दिन थे क्या थी रातें ,होती थी कितनी
बातें होती थी कितनी मुलाकातें ना किसी चीज़ का परवाह था ना किसी का डर,रंगीन होती
थी शामें चहकता था सुभह, अब ना वो वक़्त रहा ना वो माहोल अब किस्से गुफ्तगुं करू ए
मेरी तन्हाई |